PNB_Banking_Notes_Ch11-15

 


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बैंकिंग ज्ञान — संपूर्ण हिंदी नोट्स (भाग 3)

(Banking Knowledge — Complete Hindi Study Notes, Part 3)


अध्याय 11 से 15 तक

Updated Nomination Facility • Banking Regulation Act, 1949 • RBI Act, 1934

Garnishee Order & Attachment Order • FIU-Ind Reports, PEP/CIP व Money Market


नोट: महत्वपूर्ण शब्दों व नियमों के आगे अंग्रेज़ी शब्द/अर्थ कोष्ठक में दिए गए हैं ताकि परीक्षा में दोनों भाषा में समझ बनी रहे। यह भाग 1 (अध्याय 1-5) व भाग 2 (अध्याय 6-10) की अगली कड़ी है।

विषय-सूची (Index)

अध्याय 11  नामांकन सुविधा (Updated Nomination Facility)

Sections 45ZA-45ZF, Simultaneous व Successive Nomination (2025 संशोधन), Nominee नाबालिग, Claim Settlement Tables

अध्याय 12  बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949

BR Act की धारा 5 से 52 तक — Licensing, Capital, Directors, SLR, DEAF, Nomination Sections, NBFC-MFI

अध्याय 13  भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934

RBI की उत्पत्ति, संगठनात्मक संरचना, RBI Act की धाराएं, Currency Chest मानक, Functions of RBI

अध्याय 14  Garnishee Order व Attachment Order

Order Nisi/Absolute, लागू/अलागू मामले, तुलनात्मक तालिकाएं

अध्याय 15  FIU-Ind रिपोर्ट्स, PEP/CIP व Money Market

PEP, FATF, CTR/STR/CCR/NTR/CWTR, Principal Officer, Call/Notice/Term Money, T-Bills, CP, CD

अध्याय 11: नामांकन सुविधा (Updated Nomination Facility)

  अधिनियमन व दायरा (Enactment & Scope)

  • Banking Companies (Nomination) Rules, 1985 — Banking Regulation Act, 1949 की धाराओं 45 ZA से 45 ZF के अंतर्गत बनाए गए (29 मार्च 1985 को प्रस्तुत)।

  • 1) जमा (Deposits) — धारा 45 ZA व 45 ZB  2) सुरक्षित अभिरक्षा (Safe Custody) — धारा 45 ZC व 45 ZD  3) सुरक्षित जमा लॉकर (Safe Deposit Locker) — धारा 45 ZE व 45 ZF

  • Nomination सुविधा मृत जमाकर्ताओं के claims के निपटान की प्रक्रिया को सरल बनाती है।

  • Nominee, कानूनी उत्तराधिकारियों (legal heirs) के trustee के रूप में बैंक से बैलेंस राशि/सुरक्षित अभिरक्षा में रखी वस्तुओं की डिलीवरी/लॉकर की सामग्री प्राप्त करता है।

  • Act की धारा 45ZG (सहकारी बैंकों पर लागू होने पर धारा 56 के साथ पढ़ी जाती है) व Rules भी इससे संबंधित हैं।

  • धारा 45ZA से 45ZF मुख्यतः इन बातों का प्रावधान करती हैं — मृत जमाकर्ता के nominee को जमा राशि का भुगतान; मृतक द्वारा safe custody में छोड़ी वस्तुएं RBI द्वारा निर्देशित तरीके से inventory बनाकर nominee को लौटाना; locker hirer की मृत्यु पर RBI-निर्देशित तरीके से inventory बनाकर locker की सामग्री nominee को जारी करना।

  Nomination — मूल सिद्धांत

  • Nomination — बैंक खाताधारक को दिया गया वह अधिकार, जिसके तहत वह एक या अधिक ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है जो खाताधारक की मृत्यु पर धन प्राप्त करने के हकदार होंगे।

  • सभी पात्र मामलों में Nomination को नियम (rule) के रूप में लिया जाना चाहिए।

  • जब भी खाताधारक nomination नहीं करना चाहे, ऐसे इनकार को AOF में विशेष रूप से दर्ज किया जाना चाहिए।

  • ग्राहक को nomination सुविधा के फायदे समझाए जाने चाहिए। यदि फिर भी वह nomination न करने का चुनाव करे, तो उससे इस आशय का पत्र लिया जाएगा।

  • जमाकर्ता(ओं) को यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि nomination सुविधा मृतक की संपत्ति (estate) पर कानूनी उत्तराधिकारियों के अधिकार को छीनती नहीं है।

  Nomination के लाभ (Benefits)

  • खाताधारक(ओं)/locker holder(s) की मृत्यु की स्थिति में, बैंक — Succession Certificate, Letter of Administration या Court Order पर जोर दिए बिना, खाते की राशि या locker की सामग्री nominee(s) को जारी कर सकता है।

  • Joint Account में — nomination सभी joint holders द्वारा किया जाना चाहिए।

  • Nominee नाबालिग (minor) भी हो सकता है (ऐसी स्थिति में उसकी ओर से कार्य करने हेतु वैध रूप से एक अन्य व्यक्ति नियुक्त करना होगा)।

  • Nominee — कोई भी प्राकृतिक व्यक्ति (natural person) हो सकता है, जिसमें नाबालिग, insolvent व्यक्ति या NRI भी शामिल हैं।

  नई Nomination Guidelines (गजट अधिसूचना, 27.10.2025)

  • Department of Financial Services द्वारा 27.10.2025 को प्रकाशित गजट अधिसूचना अनुसार, Banking Laws (Amendment) Act, 2025 के तहत nomination के मुख्य प्रावधानों में संशोधन किए गए, जो 1 नवंबर 2025 से प्रभावी हैं।

  • जमाकर्ता या सभी जमाकर्ता मिलकर, एक या अधिक व्यक्तियों (individuals) के credit में रखी जमा राशि हेतु, एक या अधिक व्यक्तियों के पक्ष में nomination कर सकते हैं —

  (1) Simultaneous Nomination (एक साथ नामांकन)

  • जमाकर्ता अधिकतम 4 व्यक्तियों को nominate कर सकते हैं तथा प्रत्येक nominee के हिस्से/प्रतिशत (share/percentage) को इस प्रकार निर्दिष्ट कर सकते हैं कि कुल 100% हो — जिससे सभी nominees के बीच पारदर्शी वितरण सुनिश्चित हो (यह locker पर लागू नहीं होता)।

  • यदि कोई nominee जमा प्राप्त करने से पहले मर जाए, तो उस nominee के संबंध में nomination अप्रभावी (ineffective/invalid) हो जाएगी, तथा उस मृत nominee को आवंटित जमा राशि का उतना हिस्सा ऐसा माना जाएगा जैसे उस हिस्से के लिए कोई nomination की ही न गई हो — इस राशि का claim, बिना-nominee-clause वाले खातों पर लागू प्रावधानों अनुसार निपटाया जाएगा।

  (2) Successive Nomination (क्रमिक नामांकन)

  • जमाकर्ता अधिकतम 4 nominees निर्दिष्ट कर सकते हैं, जहाँ अगला nominee तभी प्रभावी (operative) होगा जब उससे ऊपर रखा गया nominee मर जाए — इससे निपटान में निरंतरता व उत्तराधिकार में स्पष्टता सुनिश्चित होती है —

  • a) पहले nominee का nomination प्रभावी होगा यदि वह जमाकर्ता(ओं) के जीवित रहते हुए भी जीवित रहे (survive करे);

  • b) दूसरे nominee का nomination केवल पहले nominee की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होगा;

  • c) क्रम में नीचे किसी भी nominee का nomination तभी प्रभावी होगा जब उससे ऊपर के क्रम के सभी nominees की मृत्यु हो चुकी हो;

  • d) यदि क्रम (order) उल्लिखित न हो, तो व्यक्तियों को nomination form में उनके नाम आने के क्रम में nominated माना जाएगा।

  • Nomination — Nomination Form में, या electronic/digital माध्यम ("e-nomination") में की जा सकती है।

  • प्रत्येक नई nomination पूर्व nomination को रद्द कर देगी, या यथास्थिति उसमें परिवर्तन करेगी।

  जमा खातों हेतु Nomination सुविधा

  • Deposit Accounts के मामले में Nomination सुविधा केवल व्यक्तियों (individuals) — जिसमें एकल स्वामित्व (sole proprietary) संस्था भी शामिल है — हेतु है।

  • Nomination स्वीकार नहीं की जाती — Joint Stock Companies, Partnership Firms, HUF, Institutional Depositors, Schools, Clubs, Wakfs आदि के मामले में।

  • उन खातों में भी Nomination स्वीकार की जा सकती है जिनमें बैंक द्वारा survivorship mandates दर्ज किए गए हों।

  • Joint deposit account के मामले में — nominee का अधिकार केवल सभी जमाकर्ताओं की मृत्यु के बाद ही उत्पन्न होता है।

  • Overdraft या Cash Credit account में — भले ही उसमें credit balance हो, Nomination स्वीकार नहीं की जा सकती।

  • उक्त nomination में परिवर्तन (variation) जमाकर्ता द्वारा, या यथास्थिति, सभी जमाकर्ताओं द्वारा मिलकर किया जाना चाहिए।

  Nomination Forms — नई जानकारी


श्रेणी (Category)

Single A/c

Joint A/c

Deposits (जमा)

DA1, DA2

DA3

Safe Custody (सुरक्षित अभिरक्षा)

SC1, SC2

SC3

Safe Deposit Locker (लॉकर)

SL1 or SL2

SL3 or SL1A / SL3A


  • मौजूदा Nomination Form — PNB-1386

  Nominee नाबालिग (Minor) होने पर

  • Banking Companies (Nomination) Rules, 1985 अनुसार — यदि किसी नाबालिग को nominee नियुक्त किया जाए, तो खाताधारक को एक major व्यक्ति का नाम देना होगा जो nominee की नाबालिगी (minority) की अवधि में धन प्राप्त करने हेतु उसकी ओर से कार्य करेगा (nomination नाबालिग की ओर से कानूनी रूप से कार्य करने के हकदार व्यक्ति द्वारा की जाएगी)।

  • RBI ने स्पष्ट किया है कि खाताधारक(ओं) का (साक्षर व्यक्ति का) nomination form पर हस्ताक्षर witness द्वारा attest किए जाने की आवश्यकता नहीं है।

  • केवल खाताधारक(ओं) के अंगूठे के निशान को ही Banking Nomination Rules, 1985 के अंतर्गत निर्धारित nomination forms पर दो गवाहों द्वारा attest किया जाना चाहिए।

  • नाबालिग के major होने पर, वह/वो नया nomination register करा सकता/सकती है।

  • 10 वर्ष व अधिक आयु के नाबालिग द्वारा खाता खोलने की अनुमति का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उसे nomination register कराने की भी अनुमति है।

  • "नाबालिग की ओर से कानूनी रूप से कार्य करने के हकदार" व्यक्ति — नाबालिग जिस धर्म/आस्था से संबंधित है, उसके अनुसार देखा जाना चाहिए।

  Nomination का Cancellation व Variation

  • Nomination या इसका रद्दीकरण (cancellation) या परिवर्तन (variation) — single account में एकमात्र जमाकर्ता द्वारा, तथा joint account में सभी जमाकर्ताओं द्वारा मिलकर किया जा सकता है।

  • यह "Either or Survivor" संचालन निर्देश वाली जमाओं पर भी लागू होता है।

  • Nomination, इसका cancellation या variation — जमा/locker hire की अवधि के दौरान किसी भी समय किया जा सकता है।

  • यदि locker एक से अधिक lessee को दिया गया हो — nomination, इसका cancellation या variation केवल तभी वैध होगा जब यह locker के सभी co-lessees द्वारा किया जाए।

  • Term deposits व lockers के मामले में nomination निर्देश — ऐसी जमा या locker agreement के renewal मात्र से समाप्त नहीं होते।

  • Nomination का registration, इसका cancellation या variation — शाखा द्वारा बिना किसी देरी के register किया जाना चाहिए ताकि registration में देरी के कारण कोई जटिलता न हो।

  Nominee को भुगतान — प्रावधान

  • Nominee, मृत ग्राहक के कानूनी उत्तराधिकारियों/legatee(s) के trustee के रूप में बैलेंस प्राप्त करता है।

  • जब भी nominee को जमा का भुगतान/locker की वस्तुओं की डिलीवरी की जाती है — इसके लिए अधिकृत व्यक्ति द्वारा स्वयं व witness (नाम निर्दिष्ट सहित) के लिए Receipt व Form पर हस्ताक्षर/execute किए जाने चाहिए।

  • जमाकर्ता की मृत्यु के बाद धन प्राप्त करने वाला nominee, धन का absolute owner नहीं बनता।

  • Nomination केवल यह इंगित करता है कि राशि प्राप्त करने हेतु कौन व्यक्ति अधिकृत है।

  • फिर भी राशि का claim संबंधित उत्तराधिकार कानून (law of succession) के अनुसार कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा किया जा सकता है।

  • बैंक को मृत ग्राहक से संबंधित claim का निपटान nominee(s) को — मृत्यु का प्रमाण व claimant(s) की उचित पहचान बैंक की संतुष्टि अनुसार प्रस्तुत होने पर — claim प्राप्ति की तिथि से 15 दिन से अधिक न होने वाली अवधि के भीतर करना चाहिए।

  Safe Deposit Locker खातों में Nomination

  • वर्तमान में BR Act की धारा 45 ZE, "Either or Survivor"/"Former or Survivor"/"Anyone or Survivors"/"Latter or Survivor" mandate वाले lockers के संबंध में nomination सुविधा प्रदान नहीं करती।

  • Locker hire करने वाले व्यक्ति या सभी व्यक्तियों द्वारा मिलकर की गई nomination — बैंक की locker vault में हो या कहीं और — अधिकतम चार व्यक्तियों के पक्ष में, क्रमिक रूप से (successively) हो सकती है।

  • BR Act, 1949 की धारा 45 ZE किसी नाबालिग को locker की सामग्री प्राप्त करने हेतु nominee बनने से नहीं रोकती (ऐसे मामलों में guardian का नाम व नाबालिग की जन्मतिथि AOF व सिस्टम में दर्ज होनी चाहिए)।

  • Safe custody में रखी वस्तुएं nominee को लौटाते समय, बैंकों को सुरक्षित अभिरक्षा हेतु उनके पास छोड़े गए sealed/closed packets खोलने की आवश्यकता नहीं है।

  Nominee को भुगतान — कानूनी स्थिति (Legal Position)

  • जमा खाते/locker में, जहाँ मृत खाताधारक/locker hirer ने वैध nomination की हो — nominee को बैलेंस राशि का भुगतान/locker की सामग्री की डिलीवरी बैंक के दायित्व का वैध निर्वहन (valid discharge) माना जाएगा — 

  • बशर्ते भुगतान/locker तक पहुँच देने के समय या उससे पहले, किसी कोर्ट या अन्य सक्षम प्राधिकरण का ऐसा आदेश प्राप्त न हुआ हो जो nominee को भुगतान/access से रोकता हो।

  • राशि पर अधिकार/claim रखने वाले किसी अन्य व्यक्ति को यह अधिकार nominee के विरुद्ध प्रयोग करना होगा।

  • बैंक, nominee के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति के claim पर ध्यान देने हेतु बाध्य नहीं है।

  बिना Survivor/Nominee Clause वाले खाते

  • जब legal heir के पक्ष में execute किए गए POA के आधार पर उसे जमा का भुगतान/locker की वस्तुओं की डिलीवरी की जाती है — Receipt व Indemnity Bond, अधिकृत व्यक्ति द्वारा स्वयं के लिए तथा संबंधित व्यक्तियों के attorney के रूप में (नाम निर्दिष्ट सहित) हस्ताक्षरित/execute होने चाहिए।

  • ₹5,000 तक की राशि/मूल्य वाले claim मामलों में — मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों के बारे में claim form में दी गई घोषणा (Notary/Magistrate द्वारा attested) के आधार पर legal heirs को भुगतान किया जा सकता है।

  • शहर से दूर स्थित सुदूर ग्रामीण शाखाओं को Notary/Magistrate द्वारा claim form की attestation पर जोर देने की आवश्यकता नहीं — claimant से Sarpanch या समकक्ष प्राधिकरण से प्रमाण पत्र मांगा जा सकता है।

  • Legal heirs/claimants को indemnity agreement execute करने पर भुगतान किया जा सकता है।

  • ₹50,000 तक की राशि वाले claim मामलों में भी — Notary/Magistrate attested घोषणा के आधार पर legal heirs को भुगतान किया जा सकता है; कोई confidential enquiry या surety जरूरी नहीं।

  • ₹50,000 से अधिक राशि वाले claim मामलों में — शाखा द्वारा मृतक के legal heirs के बारे में confidential enquiry की जानी चाहिए; claim का निपटान Incumbent-in-charge/Sanctioning Authority की संतुष्टि अनुसार surety सहित Indemnity Bond के विरुद्ध किया जाएगा।

  • Missing Person — जहाँ बैंक के खाताधारक/locker hirer के पिछले 7 वर्ष या अधिक से missing होने की रिपोर्ट हो व claimant(s) द्वारा कोर्ट का आदेश प्रस्तुत किया गया हो, वहाँ claim का निपटान किया जा सकता है।

  Fixed/Term Deposits की Premature Withdrawal (Joint Account)

  • Joint deposit account में जब एक joint holder की मृत्यु हो जाए, बैंक को मृतक के legal heirs व जीवित (surviving) जमाकर्ता(ओं) दोनों को संयुक्त रूप से भुगतान करना आवश्यक है।

  • हालांकि, यदि joint holders ने FD रखते समय या FD की अवधि के दौरान किसी भी समय — either or survivor, former/later or survivor, anyone or survivors जैसे mandate दिए हों — तो भुगतान उस mandate अनुसार किया जाएगा, ताकि उत्तराधिकारियों द्वारा कानूनी दस्तावेज़ प्रस्तुत करने में देरी से बचा जा सके।

  • अर्थात, "Either or Survivor" या "Former or Survivor" या "Anyone or Survivor" mandate वाली term deposits में — बैंक जीवित joint depositor को दूसरे की मृत्यु पर premature withdrawal की अनुमति केवल तभी दे सकते हैं, जब joint depositors से इस आशय का संयुक्त mandate मौजूद हो।

  • "Jointly" संचालन प्रकार के मामले में — भुगतान अनिवार्य रूप से मृतक के legal heirs व जीवित जमाकर्ता(ओं) दोनों को संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।

  HUF खाते व Threshold Limit

  • (A) Karta की मृत्यु होने पर — सभी major coparceners से 2 sureties सहित affidavit-cum-indemnity प्राप्त करके, इस arrangement की स्वीकृति की पुष्टि करते हुए, किसी एक सदस्य को नया Karta नियुक्त किया जा सकता है। बैंक इस दस्तावेज़ के आधार पर नए Karta को मौजूदा खाता संचालित करने की अनुमति दे सकता है।

  • (B) यदि उपरोक्त (A) की शर्तें किसी कारणवश पूरी नहीं होतीं, या coparceners के बीच नए Karta की नियुक्ति हेतु arrangement पर सहमति नहीं बनती — तो खाते को मृत जमाकर्ता की नीति अनुसार claim case के रूप में निपटाया जाएगा।

  • RBI ने निर्देशित किया है कि जहाँ आवेदन की तिथि पर देय कुल राशि (accrued interest सहित) निर्धारित Threshold Limit से कम हो, वहाँ बैंक जमा खातों के claims के निपटान हेतु सरल (simplified) प्रक्रिया अपनाएगा।

  • 'Threshold Limit' का अर्थ है — सहकारी बैंक (co-operative bank) के मामले में ₹5 लाख, तथा किसी अन्य बैंक के मामले में ₹15 लाख, या बैंक द्वारा (सहकारी बैंक सहित) निर्धारित इससे अधिक कोई सीमा।

  Claim Settlement — Survivor/Nominee Clause वाले खाते


खाते का प्रकार

मृत्यु पर निपटान (संक्षेप में)

Single Depositor

मृत्यु पर → Nominee को (या nominee न हो तो Legal Heirs को)

Joint A/c (Jointly संचालित)

एक की मृत्यु पर → शेष जीवित(ओं) + मृतक के Legal Heirs को संयुक्त रूप से; सभी की मृत्यु पर → Nominee को

Joint A/c (Either or Survivor)

एक की मृत्यु पर → Survivor को; दोनों की मृत्यु पर → Nominee को

Joint A/c (Former/Latter or Survivor)

प्राथमिक/द्वितीयक holder की मृत्यु पर → Survivor को; दोनों की मृत्यु पर → Nominee को

Joint A/c (Anyone or Survivors)

एक/अधिक की मृत्यु पर → शेष Survivor(s) को; सभी की मृत्यु पर → Nominee को


  • Term Deposit (maturity पर) व FD की Premature Withdrawal पर भी — उपरोक्त सिद्धांत ही लागू होते हैं (Premature Withdrawal में — contract की शर्तों अनुसार)।

  Claim Settlement — बिना Survivor/Nominee Clause वाले खाते


खाते का प्रकार

मृत्यु पर निपटान (संक्षेप में)

Single Depositor

Legal Heirs या उनके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को

Joint A/c (Jointly संचालित)

एक की मृत्यु पर → शेष जीवित(ओं) + मृतक के Legal Heirs को संयुक्त रूप से

Joint A/c (Either or Survivor)

एक की मृत्यु पर → Survivor को; दोनों की मृत्यु पर → सभी के Legal Heirs को

Joint A/c (Former/Latter or Survivor)

एक की मृत्यु पर → Survivor को; दोनों की मृत्यु पर → सभी के Legal Heirs को

Joint A/c (Anyone or Survivors)

एक/अधिक की मृत्यु पर → शेष Survivor(s) + मृतक(कों) के Legal Heirs को; सभी की मृत्यु पर → सभी के Legal Heirs को


  Safe Deposit Locker तक पहुँच — Claim Settlement


Locker प्रकार

Nomination सहित

Nomination रहित

Singly Operated Locker

Nominee को access मिलेगा

मृत locker hirer के Legal Heir(s) को

Joint Locker (Joint Operation)

एक/अधिक (सभी नहीं) की मृत्यु पर → मृतक के nominee(s) + शेष joint hirers को संयुक्त रूप से access; सभी की मृत्यु पर → nominee(s) को access

एक/अधिक (सभी नहीं) की मृत्यु पर → शेष hirer(s) + मृतक के legal heir(s) को; सभी की मृत्यु पर → सभी मृतक hirers के legal heirs को

Joint Locker with Survivorship Clause

BR Act धारा 45ZE फिलहाल ऐसे locker (Either/Former/Anyone/Latter or Survivor mandate) हेतु nomination सुविधा नहीं देती

एक/अधिक की मृत्यु पर → शेष hirer(s) को access; सभी की मृत्यु पर → सभी legal heirs (या उनके द्वारा प्राधिकृत कोई एक) को access व सामग्री निकालने का अधिकार


अध्याय 12: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949)

  परिचय

  • BR Act, 1949 — बैंकिंग से संबंधित कानून को समेकित (consolidate) व संशोधित करने, तथा Banking Companies के विनियमन हेतु उपयुक्त ढांचा (framework) प्रदान करने हेतु अधिनियमित किया गया।

  • इस Act के प्रावधान — बैंकिंग कंपनियों पर लागू अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होते हैं, जब तक कि Act में विशेष रूप से अन्यथा प्रावधान न किया गया हो।

  • संक्षेप में, BR Act इन विषयों से संबंधित है — बैंकिंग कंपनियों के व्यवसाय का विनियमन; बैंकिंग कंपनियों के प्रबंधन पर नियंत्रण; बैंकिंग कंपनियों का निलंबन (suspension) व समापन (winding up); Act के प्रावधानों के उल्लंघन पर दंड (penalties)।

  • लागू नहीं होता — Primary Agriculture Societies, Co-operative Land Mortgage Banks व Non-agriculture Credit Societies पर।

  महत्वपूर्ण तथ्य

  • Act 16/03/1949 से प्रभाव में आया।

  • पहले इसका नाम "Banking Companies Act" था — नाम 01/03/1966 से बदला गया।

  • 1956 में इसे Jammu & Kashmir पर भी लागू किया गया।

  • यह अधिनियम संपूर्ण भारत पर लागू होता है।

  • धारा 5(b) — Banking का अर्थ है, उधार व निवेश के उद्देश्य से जनता से धन स्वीकार करना, जो मांगने पर या अन्यथा वापस करने योग्य हो व चेक, ड्राफ्ट, आदेश या अन्यथा निकाला जा सके।

  धारा 5A से 5(n) — मुख्य परिभाषाएं

  • धारा 5-A — Approved Securities का अर्थ है वे securities जिन्हें Indian Trust Act, 1882 की धारा 20 के तहत Central Government द्वारा अधिकृत किया गया हो।

  • धारा 5-B — Banking की परिभाषा में शामिल है — जनता से उधार/निवेश के उद्देश्य से जमा के रूप में धन स्वीकार करना, जो मांगने पर या अन्यथा चेक, ड्राफ्ट व आदेश द्वारा वापस करने योग्य हो।

  • धारा 5(c) — Banking Company का अर्थ है कोई भी कंपनी जो बैंकिंग व्यवसाय करती है। (जो कंपनी माल का निर्माण करती है या कोई व्यापार करती है व केवल अपने निर्माता/व्यापारी व्यवसाय को वित्तपोषित करने हेतु जनता से जमा स्वीकार करती है, उसे इस खंड के अंतर्गत बैंकिंग व्यवसाय करने वाली नहीं माना जाएगा)।

  • धारा 5(f) — Demand Liabilities (जो मांगने पर चुकानी हों) व Time Liabilities (जो demand liabilities न हों)।

  • धारा 5(n) — Secured Advances — ऐसे advances जिनमें सुरक्षा (security) का बाजार मूल्य किसी भी समय बकाया advance से कम न हो।

  धारा 6 से 9 — व्यवसाय के रूप व प्रतिबंध

  • धारा 6.1(a) — Banking companies जिन व्यवसायों में संलग्न हो सकती हैं — धन उधार लेना, जुटाना; धन उधार देना; bills of exchange, promissory notes, coupons, drafts, bills of lading, railway receipts, warrants, debentures, certificates आदि में लेनदेन करना।

  • धारा 6.2 — Business पर प्रतिबंध — Banking company, धारा 6-1 में उल्लिखित के अतिरिक्त कोई व्यवसाय नहीं कर सकती।

  • धारा 7 — Banking Company को 'bank', 'banking', 'banker' या 'banking company' शब्द का प्रयोग करना होगा। बैंकिंग कंपनी के अलावा कोई भी कंपनी अपने नाम के भाग के रूप में 'bank', 'banker', 'banking' शब्द का उपयोग नहीं कर सकती।

  • धारा 8 — Banking company को माल की trading गतिविधियों (खरीद, बिक्री या बार्टर) में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न होने से रोकती है। परन्तु बैंक loan की वसूली हेतु उसे दी गई/उसके पास रखी securities को realize कर सकता है।

  • धारा 9 — Banking company को अपने स्वयं के उपयोग हेतु आवश्यक के अतिरिक्त, अधिग्रहण की तिथि से 7 वर्ष से अधिक अवधि तक अचल संपत्ति (immovable property) रखने से रोकती है (Non-banking assets का disposal)। RBI इस अवधि को 5 वर्ष तक बढ़ा सकता है।

  धारा 10 से 10A — निदेशक (Directors)

  • धारा 10.1(c)(iii) — Whole-time Directors एक बार में अधिकतम 5 वर्ष तक पद पर रह सकते हैं, प्रत्येक बार आगे अधिकतम 5 वर्ष के लिए renewal संभव।

  • 17 नवंबर 2022 की सरकारी अधिसूचना अनुसार — यह अवधि पहले के 5 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दी गई है, जो 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु (superannuation age) के अधीन है।

  • Part-time Directors लगातार 8 वर्ष से अधिक अवधि तक पद पर नहीं रह सकते।

  • धारा 10A(2) — कुल निदेशकों की संख्या में से 51% से कम नहीं को accountancy, agriculture, rural economy, banking, cooperation, economics, law, finance, small-scale industry आदि का ज्ञान/अनुभव होना चाहिए।

  • इस 51% में से कम से कम 2 निदेशकों को कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था (agriculture & rural economy) का विशेष ज्ञान/व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।

  • Chairman/Director का कार्यकाल — 5 वर्ष, आगे 5 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है।

  धारा 11 — न्यूनतम Paid-up Capital व Reserves

  • a) भारत में incorporated बैंक (domestic bank) — एक से अधिक राज्य में कारोबार होने पर ₹5 लाख; यदि मुंबई या कोलकाता या दोनों में हो तो ₹10 लाख

  • b) भारत के बाहर incorporated बैंक (foreign bank) — एक से अधिक राज्य में कारोबार होने पर ₹15 लाख; मुंबई या कोलकाता या दोनों में हो तो ₹20 लाख

  • Minimum Capital Requirement — किसी बैंक की initial minimum paid-up voting equity capital ₹5 अरब (₹500 करोड़) होनी चाहिए। इसके बाद बैंक को हर समय कम से कम ₹5 अरब की minimum net worth बनाए रखनी होगी (RBI परिपत्र 05/05/2016 संदर्भ)।

  • Small Finance Banks की minimum paid-up voting equity capital — ₹200 करोड़ (उन SFB को छोड़कर जो UCB से रूपांतरित हुई हैं)।

  • Payments Banks अधिकतम ₹2 लाख प्रति ग्राहक जमा की अनुमति दे सकते हैं।

  धारा 12 से 16 — पूंजी संरचना व निर्बंध

  • धारा 12 — Capital Structure — Authorised, Subscribed व Paid-up Capital का अनुपात न्यूनतम 4:2:1 होना चाहिए।

  • धारा 13 — Banking company को अपने जारी शेयरों के paid-up मूल्य के 2.5% से अधिक brokerage/commission देने से प्रतिबंधित करती है।

  • धारा 14 — Banking company को RBI की पूर्व अनुमति के बिना अपनी संपत्तियों पर charge बनाने से प्रतिबंधित करती है (धारा 14A)।

  • धारा 15 — कोई भी banking company तब तक अपने शेयरों पर dividend नहीं दे सकती जब तक कि उसके सभी capitalised expenses (preliminary व organisation expenses, share-selling commission, brokerage, हानि की राशि व tangible assets द्वारा represented न होने वाले अन्य व्यय) पूरी तरह से write off न कर दिए जाएं।

  • धारा 16 — भारत में incorporated किसी banking company के board में पहले से मौजूद व्यक्ति को किसी अन्य banking company का director नियुक्त नहीं किया जा सकता।

  धारा 17 से 21A — Reserve Fund, CRR व Advances

  • धारा 17 — भारत में incorporated हर banking company को Reserve Fund बनाना होगा तथा धारा 29 के तहत तैयार profit & loss account में दिखाए गए हर वर्ष के profit के balance में से, dividend घोषित करने से पहले, उस profit के कम से कम 25% (पहले 20% थी) के बराबर राशि Reserve Fund में transfer करनी होगी।

  • यदि banking company Reserve Fund या Share Premium Account से कोई राशि appropriate करती है, तो उसे ऐसे appropriation की तिथि से 21 दिन के भीतर इसकी सूचना RBI को देनी होगी।

  • धारा 18 — Non-Scheduled Bank को भारत में अपनी कुल demand व time liabilities के कम से कम 3% के बराबर Cash Reserve, दूसरे पिछले पखवाड़े के अंतिम शुक्रवार के अनुसार, स्वयं के पास या RBI या अन्य scheduled banks के पास बैलेंस के रूप में बनाए रखना अनिवार्य है।

  • धारा 19(1) — Banking company किसी भी उद्देश्य हेतु subsidiary company नहीं बना सकती, सिवाय उन उद्देश्यों के जो banking company के लिए करना अनुमेय (permissible) हो।

  • धारा 19(2) — किसी अन्य कंपनी में (pledgee, mortgagee या absolute owner के रूप में) shareholding — उस कंपनी की paid-up share capital के 30%, या बैंक की अपनी paid-up share capital व reserves के 30%, जो भी कम हो, से अधिक नहीं हो सकती।

  • धारा 20 — कोई भी banking company अपने ही शेयरों की सुरक्षा (security) पर कोई loan/advance नहीं दे सकती। जिस firm में बैंक का कोई director partner/manager/guarantor के रूप में involved हो, उसे व ऐसे व्यक्ति को जिसके लिए director guarantor हो, loan/advance पर प्रतिबंध।

  • धारा 21 — RBI को advances policy निर्धारित करने हेतु बैंकों को निर्देश जारी करने का अधिकार देती है — 1. advance किन उद्देश्यों हेतु दिया जा सकता है/नहीं  2. रखा जाने वाला margin  3. advances की अधिकतम राशि  4. लगाई जाने वाली ब्याज दर।

  • धारा 21A — बैंकों द्वारा वसूली गई ब्याज दर को किसी भी कोर्ट द्वारा इस आधार पर पुनर्विचार (reopen) योग्य नहीं माना जाएगा कि दर अत्यधिक (excessive) है।

  धारा 22 से 24 — Licensing, शाखा खोलना व SLR

  • धारा 22 — कोई भी कंपनी बिना RBI द्वारा जारी license के भारत में बैंकिंग व्यवसाय नहीं कर सकती। ऐसा license RBI द्वारा उपयुक्त समझी जाने वाली शर्तों के अधीन जारी किया जाएगा। RBI यह license रद्द कर सकता है — (i) यदि कंपनी भारत में बैंकिंग व्यवसाय बंद कर दे; या (ii) यदि कंपनी किसी शर्त का पालन करने में विफल रहे।

  • धारा 23 — RBI की पूर्व अनुमति के बिना — कोई भी banking company भारत में नया व्यवसाय स्थान नहीं खोल सकती, न ही भारत में/बाहर मौजूदा व्यवसाय स्थान का स्थान (branch) उसी city/town/village के भीतर बदलने के अलावा अन्यथा बदल सकती है। 1 महीने तक के अस्थायी व्यवसाय स्थान (exhibition, mela, conference आदि) हेतु कोई license आवश्यक नहीं।

  • धारा 24 (SLR) — Scheduled bank को, RBI Act 1934 की धारा 42 के तहत आवश्यक average daily balance के अतिरिक्त, तथा हर अन्य banking company को धारा 18 के तहत आवश्यक cash reserve के अतिरिक्त, भारत में ऐसी assets बनाए रखनी होंगी जिनका मूल्य — दूसरे पिछले पखवाड़े के अंतिम शुक्रवार को भारत में उसकी demand व time liabilities के कुल योग के 40% से अधिक न हो (RBI द्वारा समय-समय पर अधिसूचित)।

  धारा 26 व 26A — Unclaimed Deposits व DEAF

  • धारा 26 — हर banking company को, हर calendar year की समाप्ति के 30 दिन के भीतर, उस calendar year के अंत तक जिन खातों में 10 वर्ष से कोई लेनदेन नहीं हुआ (unclaimed deposits), उनका विवरण RBI को निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत करना होगा (fixed period की जमा राशि हेतु यह 10 वर्ष अवधि उस fixed period की समाप्ति की तिथि से गिनी जाएगी)।

  • धारा 26A — (1) RBI "Depositor Education and Awareness Fund" (DEAF) नामक एक Fund स्थापित करेगा। (2) भारत में किसी banking company के पास किसी ऐसे खाते का credit, जो 10 वर्ष से संचालित नहीं हुआ, या कोई जमा/राशि जो 10 वर्ष से अधिक समय से unclaimed है — 10 वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति से 3 महीने के भीतर इस Fund में credit की जाएगी।

  धारा 29 से 36AA — लेखा-परीक्षा, निरीक्षण व निर्देश

  • धारा 29 — बैंकों को 31 मार्च तक की स्थिति के अनुसार Balance Sheet तैयार करनी होती है — इस पर CMD व कम से कम 3 निदेशकों के हस्ताक्षर होने चाहिए।

  • धारा 30 (Audit) — धारा 29 अनुसार तैयार balance sheet व profit & loss account का ऑडिट किसी उस समय लागू कानून के तहत योग्य auditor द्वारा किया जाएगा।

  • धारा 31 (Returns का प्रस्तुतीकरण) — धारा 29 में उल्लिखित accounts व balance-sheet, auditor की रिपोर्ट सहित, निर्धारित तरीके से प्रकाशित किए जाएंगे व इसकी 3 प्रतियां जिस अवधि से संबंधित हों उसकी समाप्ति से 3 महीने के भीतर RBI को returns के रूप में प्रस्तुत की जाएंगी।

  • धारा 35 (Inspection) — RBI, banking company को उसके inspection रिपोर्ट की एक प्रति प्रदान करेगा।

  • धारा 35A — RBI सार्वजनिक हित में बैंकों को निर्देश दे सकता है (जैसे Banking Ombudsman, KYC, Clean Note Policy, SB व Time Deposits पर ब्याज दर आदि)।

  • धारा 35 AA — भारत सरकार के आदेश पर, RBI किसी banking company को Insolvency and Bankruptcy Code-2016 के अंतर्गत bankruptcy resolution process हेतु निर्देशित कर सकता है।

  • धारा 35 AB — RBI बैंकों को bad accounts के निपटान (disposal) हेतु निर्देश दे सकता है।

  • धारा 36AA — RBI को प्रबंधकीय व अन्य व्यक्तियों को पद से हटाने की शक्ति — यदि आवश्यक हो तो RBI किसी banking company के chairman, director, chief executive officer या अन्य officer/employee को आदेश द्वारा हटा सकता है।

  धारा 45 से 45Z — पुनर्गठन, रिकॉर्ड व चेक वापसी

  • धारा 45 — RBI को banking company के व्यवसाय के निलंबन (suspension) हेतु Central Government से आवेदन करने व पुनर्गठन/समामेलन (reconstitution/amalgamation) की योजना तैयार करने की शक्ति है।

  • धारा 45Y — रिकॉर्ड के संरक्षण हेतु Central Government के नियम बनाने की शक्ति — RBI से परामर्श के बाद, Official Gazette में अधिसूचना द्वारा, वह अवधि निर्दिष्ट कर सकती है जिसके लिए (a) banking company अपनी books, accounts व अन्य documents संरक्षित रखेगी; (b) banking company अपने द्वारा भुगतान किए गए विभिन्न instruments अपने पास रखेगी।

  • धारा 45Z — ग्राहकों को paid cheques की वापसी — यदि ग्राहक धारा 45Y के तहत निर्धारित अवधि की समाप्ति से पहले paid instrument वापस मांगे, तो banking company उसकी true copy बनाकर व अपने पास रखकर ही instrument वापस करेगी। बैंक ऐसी copy बनाने की लागत ग्राहक से वसूल करने का हकदार होगा।

  धारा 45ZA से 45ZF — Nomination संबंधी प्रावधान (संक्षेप)

  • 45 ZA — जमाकर्ताओं के धन के भुगतान हेतु Nomination।

  • 45 ZB — जमा के बारे में अन्य व्यक्तियों के claim की सूचना ग्राह्य (receivable) नहीं — केवल Court Order अपवाद।

  • 45 ZC — बैंक के पास सुरक्षित अभिरक्षा (safe custody) में रखी वस्तुओं की वापसी हेतु Nomination।

  • 45 ZD — वस्तुओं के बारे में अन्य व्यक्तियों के claim की सूचना ग्राह्य नहीं, केवल Court Order अपवाद।

  • 45 ZE — Locker की सामग्री nominee को जारी करना।

  • 45 ZF — Lockers के बारे में अन्य व्यक्तियों के claim की सूचना ग्राह्य नहीं, केवल Court Order अपवाद।

  • धारा 47A — RBI उल्लंघन (violations) पर दंड (penalty) लगा सकता है।

  • धारा 49A — Banking Company/RBI/SBI के अतिरिक्त, कोई भी व्यक्ति चेक द्वारा निकाली जा सकने वाली जमा स्वीकार नहीं कर सकता।

  • धारा 52 — Central Government सभी मामलों हेतु नियम बना सकती है।

  NBFC-MFI — संशोधित दिशानिर्देश

  • "NBFC-MFI" की परिभाषा — एक non-deposit taking NBFC जिसकी कुल assets का न्यूनतम 60% (पहले 75% था) "microfinance loans" में लगा हो।

  • Microfinance Loan — एक collateral-free loan जो ऐसे household को दिया जाए जिसकी वार्षिक household आय (actual व projected दोनों) ₹3,00,000 तक हो। इस प्रयोजन हेतु household का अर्थ है — एक individual family unit, अर्थात पति, पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे।

अध्याय 13: भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (RBI Act, 1934)

  RBI की उत्पत्ति (Origin of RBI) — समयरेखा

  • 1926 — Royal Commission ने भारत हेतु एक Central Bank की स्थापना की सिफारिश की।

  • 1927 — इसी आधार पर legislative assembly में एक bill पेश किया गया, परन्तु विभिन्न वर्गों में सहमति न बनने के कारण इसे वापस ले लिया गया।

  • 1933 — भारतीय संवैधानिक सुधारों (Indian Constitutional Reforms) पर White Paper में RBI की स्थापना की सिफारिश की गई; इसके लिए एक नया bill पेश किया गया।

  • 1934 — Bill पारित हुआ व Governor की सहमति (assent) प्राप्त हुई।

  • 1935 — RBI ने 1 अप्रैल को ₹5 करोड़ की पूंजी के साथ अपना कार्य आरंभ किया।

  • 1942 — RBI बर्मा (अब म्यांमार) की मुद्रा जारी करने वाली प्राधिकरण संस्था नहीं रही।

  • 1947 — RBI ने बर्मा सरकार के बैंकर के रूप में कार्य करना बंद कर दिया।

  • 1948 — RBI ने पाकिस्तान को central banking सेवाएं देना बंद कर दिया।

  • 1949 — भारत सरकार ने RBI का राष्ट्रीयकरण (nationalise) किया।

  परिचय व उद्देश्य

  • RBI Act, 1934 — Reserve Bank of India के गठन हेतु अधिनियमित किया गया, जिसके उद्देश्य थे — 1) बैंक नोटों के जारी होने का विनियमन  2) मौद्रिक स्थिरता (monetary stability) सुरक्षित रखने हेतु reserves बनाए रखना  3) देश की मुद्रा व credit प्रणाली को देश के हित में संचालित करना।

  • RBI Act 6 मार्च 1934 को प्रभाव में आया। बदलते समय की मांगों को पूरा करने हेतु इसमें समय-समय पर संशोधन हुए हैं।

  • इस Act में अंतिम बड़ा संशोधन RBI (Amendment) Act, 1997 द्वारा किया गया।

  • हाल ही में IT Act, 2000 द्वारा एक प्रावधान डाला गया जो RBI को बैंकों व वित्तीय संस्थाओं की payment system को विनियमित करने में सक्षम बनाता है।

  • यह Act RBI के गठन, शक्तियों व कार्यों से संबंधित है।

  • नया क्या है? — RBI ने JioHotstar के साथ मिलकर 'RBI Unlocked: Beyond the Rupee' नामक पांच-भाग की documentary series लॉन्च की है (निर्माण — Chalkboard Entertainment) — यह परियोजना RBI द्वारा अपने 90-वर्षीय इतिहास का दस्तावेजीकरण करने व इसके विभिन्न कार्यों/भूमिकाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु शुरू की गई है।

  मूल तथ्य

  • RBI 01/04/1935 को अस्तित्व में आया।

  • शुरुआत में RBI एक Private Sector Bank था — इसे 01/01/1949 को राष्ट्रीयकृत किया गया।

  • RBI की संपूर्ण पूंजी केंद्र सरकार के पास है।

  • RBI का Central Office मुंबई में है, साथ ही 4 Zonal Offices — मुंबई, कोलकाता, दिल्ली व चेन्नई — व अधिकांश राज्यों की राजधानियों/अन्य शहरों में शाखाएं हैं।

  • RBI, Central Board of Directors के निर्देशन में कार्य करता है। Board, Governor से परामर्श के बाद केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करता है।

  • Board में — Governor व अधिकतम 4 Deputy Governors (केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त); 4 Local Boards में से एक-एक Director (केंद्र सरकार नियुक्त); 10 Directors केंद्र सरकार द्वारा नामित; 1 सरकारी अधिकारी1 FM प्रतिनिधि केंद्र सरकार द्वारा नामित।

  • RBI ने Credit Information Bureau (India) Ltd. का गठन किया है, जो ₹1 करोड़ या अधिक outstanding balance वाले सभी doubtful, loss व suit-filed खातों का विवरण एकत्रित करता है।

  • RBI का Central Office शुरुआत में कलकत्ता (अब कोलकाता) में स्थापित था, परन्तु 1937 में बंबई (अब मुंबई) स्थानांतरित कर दिया गया।

  संगठनात्मक संरचना (Central Board of Directors)

  • Central Board — RBI की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था (highest decision-making body)।

  • कुल सदस्य — 21

  • Official Directors (5) — Governor + अधिकतम 4 Deputy Governors, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।

  • Non-Official Directors (16) — 4 Local Headquarter Directors (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम — प्रत्येक Local Board से एक प्रतिनिधि); 10 Government Nominated Directors; 2 Finance Ministry प्रतिनिधि (केंद्र सरकार द्वारा नामित सरकारी अधिकारी)।

  • RBI Grade B परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सामान्य पदोन्नति क्रम — Manager → Assistant General Manager → Deputy General Manager → General Manager → Chief General Manager → Executive Director → Principal Chief General Manager → Deputy Governor → Governor।

  RBI Act — मुख्य धाराएं (Sections)

  • यह Act संपूर्ण भारत पर लागू है।

  • धारा 3 — "Reserve Bank of India" नामक एक बैंक का गठन किया जाएगा, जिसका उद्देश्य केंद्र सरकार से मुद्रा प्रबंधन (currency management) का कार्यभार लेना व Act के प्रावधानों अनुसार बैंकिंग का व्यवसाय संचालित करना है।

  • धारा 4 — RBI की पूंजी ₹5 करोड़ होगी।

  • धारा 6 — RBI बंबई, कलकत्ता, दिल्ली व मद्रास में कार्यालय स्थापित करेगा तथा भारत में कहीं भी, या केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति से भारत के बाहर भी, शाखाएं/एजेंसियां स्थापित कर सकता है।

  • धारा 8 — Central Board में निम्न Directors होंगे — a) Official Director (पूर्णकालिक) — Governor व अधिकतम 4 Deputy Governors (केंद्र सरकार नियुक्त)  b) Non-Official Director — धारा 9 के तहत गठित 4 Local Boards में से एक-एक, कुल 4 Directors (केंद्र सरकार नामित)  c) 10 Directors (केंद्र सरकार नामित, जिनमें 2 सरकारी अधिकारी व अन्य विभिन्न क्षेत्रों से)।

  • धारा 9 — Local Boards — First Schedule में निर्दिष्ट 4 क्षेत्रों में से प्रत्येक हेतु एक Local Board गठित की जाएगी, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 5 सदस्य होंगे (क्षेत्रीय व आर्थिक हितों तथा सहकारी/स्वदेशी बैंकों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए)। सदस्य आपस में एक Chairman चुनेंगे। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 4 वर्ष होगा, पुनः नियुक्ति योग्य। Local Board, Central Board को सलाह देती है व Central Board द्वारा सौंपे गए कार्य करती है।

  • Coin Deposit — RBI ने ग्राहकों द्वारा बैंक खातों में सिक्के जमा करने की कोई सीमा निर्धारित नहीं की है — बैंक अपने ग्राहकों से किसी भी मात्रा में सिक्के स्वीकार करने हेतु स्वतंत्र हैं।

  RBI के कार्य (Functions)

  • Traditional (पारंपरिक) — मुद्रा जारी करना (Issue of Currency); सरकार का बैंकर (Banker to Govt); बैंकों का बैंकर (Banker's Bank); विनिमय प्रबंधन व नियंत्रण (Exchange Management & Control)।

  • Promotional (प्रोत्साहनकारी) — बैंकिंग आदतों व वित्तीय प्रणाली के विकास को बढ़ावा देना; वित्त व व्यापार के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा देना; NABARD के माध्यम से कृषि credit का विस्तार; लघु उद्योग (Small Scale Industry) वित्त की व्यवस्था।

  • Supervisory (पर्यवेक्षी) — बैंकों को license जारी करना व renewal करना; banking inspection करना; Non-Banking Financial Institutions पर पूर्ण नियंत्रण; deposit insurance scheme लागू करना; भुगतान प्रणाली (payment) व केंद्रीय clearing house के रूप में कार्य करना; वार्षिक रिपोर्ट, साप्ताहिक रिपोर्ट व वाणिज्यिक बैंकों की trends/progress रिपोर्ट संकलित व प्रकाशित करना।

  मुद्रा प्रबंधन व Public Debt से संबंधित कार्य

  • Demonetization — RBI की सिफारिश पर, केंद्र सरकार किसी विशेष मूल्यवर्ग (denomination) की मुद्रा को demonetize कर सकती है।

  • Coin Distribution व Currency Distribution भी RBI के कार्यों में शामिल है।

  • RBI, Public Debt Act, 1944 व RBI Act के अंतर्गत केंद्र व राज्य सरकारों के सार्वजनिक ऋण (Public Debt) का प्रबंधन करता है।

  • Treasury Bills — केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले short-term उधार, RBI द्वारा नीलामी (auction) के आधार पर बेचे जाते हैं।

  • Open Market Operations (OMO) — बैंकों की liquidity स्थिति में बदलाव लाने हेतु RBI द्वारा securities की खरीद-बिक्री।

  • RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली Subsidiaries — a) DICGC (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation)  b) BRBNMPL (Bharatiya Reserve Bank Note Mudran Private Limited)  c) ReBIT (Reserve Bank Information Technology Private Limited)  d) IFTAS (Indian Financial Technology and Allied Services)  e) RBIH (Reserve Bank Innovation Hub)।

  भारतीय बैंकिंग प्रणाली की संरचना व Scheduled Bank

  • संरचना — Scheduled Banks व Unscheduled Banks → Commercial Banks व Cooperative Banks → (Commercial में) Public Sector, Private Sector, Foreign Sector व Regional Rural Banks।

  • Scheduled Bank — वह बैंक जो RBI Act की दूसरी अनुसूची (Second Schedule) में शामिल हो।

  • Scheduled Bank हेतु शर्तें — न्यूनतम पूंजी व Reserve ₹5 लाख; RBI को संतुष्ट करना होगा कि उसका कामकाज जमाकर्ताओं के हितों के लिए हानिकारक तरीके से संचालित नहीं है; उसे State Co-op Bank होना चाहिए, या Companies Act 1956 के अंतर्गत कोई कंपनी, या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कोई संस्था।

  • Liquidity Adjustment Facility (LAF) — 1) Repo Auctions (securities बेचना) — बाजार में liquidity डालने हेतु  2) Reverse Repo Auctions — बाजार से liquidity अवशोषित (absorb) करने हेतु।

  • नोट — Repo Rate, Reverse Repo Rate, Marginal Standing Facility (MSF) Rate व Bank Rate — ये सभी दरें समय-समय पर बदलती रहती हैं, अतः परीक्षा से पहले RBI की वर्तमान Monetary Policy से नवीनतम दरें अवश्य जांच लें।

  अन्य महत्वपूर्ण धाराएं (Sections)

  • धारा 2 — Scheduled Bank — जिसे RBI Act, 1934 की दूसरी अनुसूची में रखा गया हो।

  • धारा 17 — RBI द्वारा किए जाने वाले विभिन्न व्यवसाय दर्शाई गई है।

  • धारा 18 — RBI बैंकों को concessional दर पर आपातकालीन (emergency) loans प्रदान करता है।

  • धारा 20 — सरकार का बैंकर (Banker to the Government)।

  • धारा 21 — भारत में सरकारी व्यवसाय हेतु अधिकृत।

  • धारा 21A — RBI किसी राज्य सरकार के साथ समझौते द्वारा — a) उसके सभी money, remittance, exchange व banking लेनदेन (जिसमें उसकी सभी cash balances को बिना ब्याज के बैंक में जमा करना शामिल है), तथा b) उस राज्य की public debt का प्रबंधन व किसी नए loan का issue — अपने ऊपर ले सकता है। बैंक केंद्र व राज्य सरकारों को 3 महीने में चुकाने योग्य ways & means advances प्रदान करता है।

  • धारा 22 — बैंक नोट जारी करने हेतु अधिकृत।

  • धारा 24 — नोट के मूल्यवर्ग (Denominations) — ₹2, 5, 10, 20, 50, 100, 200, 500, 1000, 2000, 5000, 10000; अधिकतम ₹10,000 मूल्यवर्ग के नोट छापे जा सकते हैं। भारत सरकार किसी भी बढ़े हुए मूल्यवर्ग के नोट को बंद कर सकती है या इसका आदेश दे सकती है।

  धारा 19 — RBI जिन व्यवसायों को नहीं कर सकता

  • RBI निम्न कार्य नहीं कर सकता — 1. किसी वाणिज्यिक, औद्योगिक या अन्य उपक्रम में व्यापार करना या प्रत्यक्ष हित रखना।

  • 2. किसी banking company या अन्य कंपनी के शेयर खरीदना, या ऐसे शेयरों की सुरक्षा पर loan देना।

  • 3. अचल संपत्ति (immovable property) या उससे संबंधित title दस्तावेज़ों की सुरक्षा पर धन advance करना।

  • 4. Loans या advances देना (Act में अन्यथा उल्लिखित को छोड़कर)।

  • 5. मांग पर भुगतान योग्य के अलावा bills निकालना या स्वीकार करना।

  • 6. जमा या current accounts पर ब्याज देना।

  • रुपया हमारा राष्ट्रीय मुद्रा है (Act की धारा 22 के तहत, भारत में बैंक नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार RBI के पास है। धारा 25 कहती है कि बैंक नोटों का design, form व material वही होगा जिसे RBI के Central Board की सिफारिशों पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत किया जाए।)

  बैंक नोट संबंधी धाराएं

  • धारा 26 — RBI द्वारा जारी नोट legal tender हैं, इनकी गारंटी केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है।

  • धारा 28 — किसी भी व्यक्ति को केंद्र सरकार या बैंक से किसी खोए, चोरी हुए, कटे-फटे या अपूर्ण मुद्रा नोट का मूल्य वसूलने का अधिकार नहीं होगा।

  • धारा 29 के तहत RBI द्वारा जारी नोट, Indian Stamp Act के तहत stamp duty से मुक्त हैं।

  • धारा 31 — bearer को देय note के जारी होने पर प्रतिबंध (RBI या Act द्वारा स्पष्ट रूप से अधिकृत केंद्र सरकार के अतिरिक्त भारत में कोई भी व्यक्ति मांगने पर bearer को देय bill of exchange, hundi, promissory note या payment engagement नहीं बना/जारी नहीं कर सकता, न ही ऐसे bills/hundis/notes पर धन उधार ले सकता है)।

  • धारा 33 — Currency Note जारी करना — RBI केवल अनुमोदित assets (gold coin, bullion, विदेशी securities, rupee coin आदि) के 100% backing के विरुद्ध ही नोट जारी करता है।

  • मुद्रा वितरण व Currency Chest — बैंकों के currency chest में शेष राशि RBI की संपत्ति होती है।

  • धारा 42 — Scheduled Banks को RBI के पास current account में अपनी दैनिक बैलेंस का एक निश्चित प्रतिशत नकद रखना अनिवार्य है — इसे Cash Reserve Ratio (CRR) कहा जाता है।

  • धारा 42C के तहत RBI को किसी बैंक का नाम Second Schedule से हटाने की शक्ति प्राप्त है।

  • एक रुपये का नोट ही एकमात्र ऐसा नोट है जिस पर Finance Secretary के हस्ताक्षर होते हैं — अन्य सभी नोट bearer notes हैं जिन पर RBI Governor के हस्ताक्षर होते हैं।

  • नोटों पर छपा वचन खंड (promissory clause) — "मैं धारक को ... रुपये अदा करने का वचन देता हूं" — यह बैंक नोट धारक के प्रति बैंक के दायित्व को दर्शाता है।

  • RBI Act, 1934 की धारा 26 के अनुसार, बैंक बैंकनोट का मूल्य चुकाने हेतु उत्तरदायी है।

  बैंक नोट — अन्य प्रावधान

  • धारा 25 — बैंक नोटों का Form — design, form व material वही होगा जिसे Central Board की सिफारिशों पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत किया जाए।

  • धारा 27 (Re-issue Notes) — RBI फटे, विकृत (defaced) या अत्यधिक खराब हो चुके नोटों को पुनः जारी नहीं करेगा।

  • धारा 29 — बैंक नोटों पर stamp duty से बैंक की छूट — RBI द्वारा जारी बैंक नोटों के संबंध में Indian Stamp Act, 1899 के तहत कोई stamp duty देय नहीं है।

  • धारा 34 — Issue Department की देनदारियां — प्रचलन में मौजूद भारत सरकार के currency notes व bank notes की कुल राशि के बराबर होंगी।

  • धारा 38 — केंद्र सरकार, बैंक के माध्यम के अलावा किसी भी रुपये को प्रचलन में नहीं लाएगी।

  • धारा 42 — Second Schedule में शामिल हर बैंक को बैंक के पास एक average daily balance बनाए रखनी होगी, जो demand व time liabilities के कुल योग के एक निश्चित प्रतिशत से कम न हो। "average daily balance" का अर्थ है — किसी पखवाड़े के प्रत्येक दिन कारोबार बंद होने पर रखे गए बैलेंस का औसत।

  • धारा 45-IB — हर non-banking financial company को भारत में शर्तों के अधीन unencumbered approved securities में निवेश करना व निवेश जारी रखना होगा।

  अन्य तथ्य — नोट व सिक्के

  • धारा 49 — Bank समय-समय पर मानक दर (Bank Rate — publication of Bank Rate) सार्वजनिक करेगा — जिस दर पर वह Act के तहत खरीद योग्य bills of exchange या अन्य commercial paper खरीदेगा/re-discount करेगा।

  • *series notes — दोषपूर्ण रूप से मुद्रित नोटों के प्रतिस्थापन हेतु (अगस्त 2006 तक serial numbered नोट छापे जाते थे, non-sequential numbering 2011 में शुरू की गई)।

  • भारत में बैंकनोट का कागज 100% कपास (cotton) से बनाया जाता है।

  • प्रचलन में सिक्के — 50 पैसे, ₹1, ₹2, ₹5, ₹10 व ₹20 के मूल्यवर्ग में।

  • Coinage Act, 2011 के तहत ₹1000 तक के सिक्के जारी किए जा सकते हैं।

  • Mahatma Gandhi (New) Series (MGNS) — दृष्टिबाधित व्यक्तियों की सहायता हेतु विशेषताएं — तीव्र रंग-विरोधाभास (sharp colour contrast) योजना; ₹100 व उससे ऊपर के नोटों में angular bleed lines व पहचान चिह्न; प्रत्येक नोट के सामने की तरफ उभरी हुई (raised/intaglio) छपाई में अलग-अलग मूल्यवर्ग हेतु अलग आकार के पहचान चिह्न — जैसे ₹2000 हेतु क्षैतिज आयत, ₹500 हेतु वृत्त, ₹200 हेतु उभरा चिह्न H, ₹100 हेतु त्रिभुज। इन मूल्यवर्गों में अंक भी उभरी छपाई में नोट के मध्य भाग में प्रमुखता से दिखाए जाते हैं।

  Currency Chest — न्यूनतम मानक


श्रेणी (Category)

Strong Room का क्षेत्रफल (वर्ग फुट)

प्रोसेसिंग क्षमता (पीस/दिन)

सामान्य स्थान (Normal Places)

1,500

6,60,000

पहाड़ी/दुर्गम स्थान (Hilly/Inaccessible)

600

2,10,000


  • Currency Chest व Small Coin Depot — बैंकवार संख्या (31/03/2026 अनुसार) — SBI: 1298 Currency Chests, 1073 Small Coin Depots; Nationalised Banks: 1053, 834; Private Banks: 229, 196; Co-op/Foreign/RRB/अन्य: 19, 16; कुल: 2599 Currency Chests, 2119 Small Coin Depots।

  • Currency Chests में State Bank of India का हिस्सा सबसे अधिक (लगभग 50%) है।

  RBI द्वारा विनियमित संस्थाएं व Portals

  • RBI के जागरूकता व सेवा पोर्टल्स — Sachet (शिकायत दर्ज करने हेतु — "जानकार बनिए, सतर्क रहिए"), Retail Direct, RBI Museum, PRAVAAH, FinTech Portal, RBIDATA आदि।

अध्याय 14: Garnishee Order व Attachment Order

  Garnishee Order — परिचय

  • Garnishee Order — यह Code of Civil Procedure, 1908 के Order 21, Rule 46 के प्रावधानों के अंतर्गत कोर्ट द्वारा जारी किया गया एक आदेश है।

  • "Garnishment" की अवधारणा 1976 के संशोधन अधिनियम द्वारा civil procedure code में शामिल की गई — यह एक उल्लेखनीय (remarkable) कानूनी प्रावधान है।

  • उदाहरण — मान लीजिए A, B का ₹2,000 देनदार है। A, B को राशि लौटाने से इनकार करता है व B, A पर मुकदमा करता है व अपने पक्ष में डिक्री (decree) प्राप्त करता है। यहाँ B judgment-creditor व A judgment-debtor है। B को पता चलता है कि A के किसी बैंक खाते में धन है, व वह A के बैंक में मौजूद धन को attach करवाकर अपनी डिक्री की पूर्ति चाहता है। इस हेतु वह कोर्ट से A के बैंक खाते में जमा धन को attach करने वाला Garnishee Order प्राप्त करता है। इस उदाहरण में — बैंकर = Garnishee, तथा B = Garnisher (कार्रवाई शुरू करने वाला व्यक्ति)।

  Garnishee Order में पक्षकार (Parties)

  • इसमें तीन पक्ष शामिल होते हैं —

  • 1) Garnisher — अर्थात Judgment Creditor (जिसे Decree Holder भी कहा जाता है)।

  • 2) Judgment Debtor

  • 3) Garnishee — अर्थात judgment debtor का देनदार (debtor's debtor) — यह बैंक होता है।

  • सरल शब्दों में — Garnisher वह है जो कार्रवाई शुरू (initiate) करता है; Judgment Debtor वह है जिसके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है; तथा Garnishee (बैंकर) वह है जिस पर आदेश तामील (served) होता है।

  Garnishee Order के प्रकार

  • 1) Order Nisi — यह एक कोर्ट आदेश है जो एक निश्चित शर्त पूरी न होने पर भविष्य की तिथि से लागू होगा। जब judgment creditor Garnishee order प्राप्त करने हेतु कोर्ट में आवेदन करता है, तो सबसे पहले कोर्ट एक अंतरिम (interim) आदेश जारी करता है जो garnishee को debtor के विरुद्ध मामले का निर्णय होने तक कोई भी देय राशि का भुगतान करने से रोकता है। Order Nisi की तामील "order to show cause" के साथ जुड़ी होती है, जो बैंक पर तामील की जाती है ताकि यदि कोई कारण हो तो वह बता सके।

  • 2) Order Absolute — यह कोर्ट द्वारा जारी एक आदेश है कि garnishee (तीसरे पक्ष) द्वारा judgment debtor को देय ऋण, कोर्ट के माध्यम से judgment creditor को चुकाया जाए। यह Order Absolute तभी जारी किया जाता है जब कोर्ट यह निर्णय ले चुका हो कि garnishee, judgment debtor का इतना ऋणी है जिसे attach किया जा सकता है।

  Garnishee Order की राशि

  • Garnishee Order में सामान्यतः राशि उल्लिखित नहीं होती। यदि कोई राशि उल्लिखित न हो तो पूरा बैलेंस attach किया जाना चाहिए। यदि कोई राशि उल्लिखित हो तो केवल उतनी ही राशि ग्राहक के खाते से block की जाएगी।

  Garnishee Order — लागू होने वाली विशेषताएं (Features)

  • यह वहाँ लागू होता है जहाँ ग्राहक के खाते में credit balance मौजूद हो।

  • बैंक व judgment debtor के बीच संबंध debtor-creditor का होता है — बैंक, judgment debtor का debtor होता है, जो बैंक का creditor है।

  • किसी loan की सुरक्षा हेतु ली गई fixed deposits पर यह लागू नहीं होता। यदि FD पर loan दिया गया हो, तो loan समायोजित करने के बाद बची राशि पर यह लागू होता है।

  • Garnishee Order मौजूदा ऋणों (existing debts) व देय होने वाले ऋणों (debts accruing due) — जैसे SB/CD, RD/FD Accounts — दोनों पर लागू होता है।

  • Garnishee Order केवल judgment debtor के उन खातों पर लागू होता है जिनमें credit balance हो।

  • भविष्य में मैच्योर होने वाली term deposits को भी attach करता है।

  Garnishee Order — लागू न होने वाले मामले

  • यह उन cheques, drafts, bills आदि पर लागू नहीं होता जो ग्राहक द्वारा collection हेतु भेजे गए हों व order प्राप्त होने के समय अभी uncleared हों।

  • बैंक द्वारा अभी प्राप्त न किए गए shares/securities के sale proceeds को attach नहीं किया जा सकता।

  • Garnishee Order केवल "ऋण (debt)" को attach करता है — यह बैंक के पास debtor के रूप में रखे गए के अलावा किसी fund/goods/money तक विस्तारित नहीं होता। अतः safe custody, safe deposit locker, या trust में रखे धन को Garnishee Order द्वारा attach नहीं किया जा सकता।

  • किसी व्यक्ति द्वारा fiduciary क्षमता (fiduciary capacity) में रखे गए खाते — व्यक्तिगत नाम में जारी Garnishee Order द्वारा attach नहीं किए जाते।

  • सामान्यतः वेतन (salary) को attach नहीं किया जा सकता।

  • Notice पर देय Call Deposits को attach नहीं किया जा सकता।

  • किसी बैंक की विदेशी शाखाओं (foreign branches) में debtor के नाम मौजूद बैलेंस को attach करने हेतु कोई Garnishee Order जारी नहीं किया जा सकता।

  • Garnishee Order का पालन करने से पहले बैंक अपने set-off के अधिकार का प्रयोग कर सकता है।

  • जहाँ किसी cheque को banker द्वारा "good for payment" के रूप में चिह्नित किया जा चुका हो — वहाँ भी यह लागू नहीं होता।

  Garnishee Order — कुछ और लागू होने योग्य मामले

  • यदि किसी partnership account पर order तामील हो, तो यह partners के व्यक्तिगत खातों को भी attach करता है।

  • किसी बैंक की सभी शाखाओं को एक ही इकाई (single entity) माना जाता है।

  • जहाँ कोई cheque clearing में भुगतान हेतु प्राप्त हुआ हो व Garnishee Order उस समय-सीमा से पहले प्राप्त हो जाए जिसके भीतर clearing cheque को अवैतनिक (unpaid) लौटाया जा सकता है — वहाँ भी यह लागू होता है।

  Attachment Order

  • Garnishee Order के विपरीत, जो दो चरणों (order nisi व order absolute) में जारी होता है, Attachment Order — जो सामान्यतः Income Tax Department द्वारा जारी किया जाता है — सीधा (direct) होता है।

  • Attachment Order सरकारी बकाया, राजस्व (revenue) या कर (tax) की वसूली हेतु सरकारी प्राधिकरण (Government Authority) द्वारा जारी किया जाता है (यह Wealth Tax Act के तहत भी जारी किया जा सकता है)।

  • यदि बैंकर Attachment Order का पालन करने में विफल रहता है, तो वह order की राशि के लिए उत्तरदायी होगा व उसे "assessee in default" माना जाएगा।

  • हालांकि, order लागू करने से पहले बैंक को set-off का अधिकार उपलब्ध है।

  • जब Garnishee Order व Attachment Order दोनों एक साथ प्राप्त हों, तो Attachment Order को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  • यदि Attachment Order व्यक्तिगत नाम में हो, तो यह partnership firm के खातों (जहाँ वह partner हो) या trust के खातों (जहाँ वह trustee हो) को attach नहीं करता।

  Attachment Order — याद रखने योग्य बिंदु

  • Income Tax प्राधिकरण, Income Tax Act, 1961 की धारा 226(3) के अंतर्गत Attachment Orders जारी करते हैं।

  • Order प्राप्त होने पर की जाने वाली कार्रवाई — i. Order प्राप्त होने पर ग्राहक को notice दी जानी चाहिए।  ii. खाताधारक को I.T.O. (Income Tax Officer) को किए जाने वाले भुगतान के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

  • Income Tax Attachment Order की तरह, Attachment Orders — Wealth Tax Act, Recovery of Debts due to Banks & Financial Institutions Act, 1993, तथा विभिन्न राज्यों के Sales Tax Acts के अंतर्गत भी जारी किए जा सकते हैं।

  • Attachment Order — order प्राप्त होने के बाद खाते में जमा किए गए धन पर भी तब तक लागू रहता है जब तक कि यह पूरी तरह संतुष्ट (satisfied) न हो जाए — जबकि Garnishee Order बाद में की गई जमाओं पर लागू नहीं होता।

  • फिर भी, order लागू करने से पहले बैंक को set-off का अधिकार उपलब्ध है।

  • राशि उल्लिखित न करने वाला आदेश (order) एक वैध आदेश नहीं माना जाता।

  Garnishee Order बनाम Attachment Order — तुलना तालिका


विवरण (Particulars)

Garnishee Order

Attachment Order

जारीकर्ता प्राधिकरण

सक्षम न्यायालय (Competent Court)

राजस्व/कर प्राधिकरण (Revenue/Tax Authority)

किस Act के अंतर्गत

Civil Procedure Code, Sec 60, Order 21 Rule 46

संबंधित Act — जैसे Income Tax हेतु Sec 226

जमाकर्ता कहलाता है

Judgment Debtor

Assessee

बैंक कहलाता है

Judgment Debtor's Debtor (Garnishee)

Assessee's Debtor

Order के चरण

दो चरण — Order Nisi व Order Absolute

भुगतान आदेश के रूप में सीधा जारी

उद्देश्य

निजी बकाया (Private Due) की वसूली

सांविधिक/सरकारी बकाया (Statutory Due) की वसूली

राशि

विशेष रूप से उल्लिखित हो सकती है

अवश्य विशेष रूप से उल्लिखित होनी चाहिए

किस राशि पर लागू

Order प्राप्ति के समय Garnishee के पास मौजूद स्पष्ट (clear) राशि

सभी राशि पर (order के समय या बाद में)

Set-off का अधिकार

वैध व देय ऋणों हेतु उपलब्ध

वैध व देय ऋणों हेतु उपलब्ध

FDR (Collateral Security के रूप में)

लागू नहीं (Not Applicable)

लागू नहीं (Not Applicable)


  तुलना — विभिन्न खातों पर प्रभाव


विवरण

Garnishee Order

Attachment Order

सभी deposit accounts (गैर-देय FD सहित) पर लागू

हां

हां

Joint accounts, order एकल नाम में

लागू नहीं

Pro-rata लागू

A का खाता, order उसके नाम में

लागू

लागू

Order Partnership के नाम में, खाता Partner के नाम में

लागू

लागू

Joint account, order समान joint नामों में

लागू

लागू

Order partners/trustee/executor/liquidator/director के नाम में

Firm/Trust/Company के नाम वाले (fiduciary capacity) खातों पर लागू नहीं

Firm/Trust/Company के नाम वाले खातों पर लागू नहीं

मृतक (Deceased) का खाता

लागू (एक बार execution शुरू होने पर रोका नहीं जा सकता)

लागू

दिवालिया (Insolvent) खाता

लागू नहीं

लागू

अप्रयुक्त CC/OD सीमा

लागू नहीं

लागू नहीं

Order लागू न करने पर परिणाम

न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court)

Assessee in Default

Collection हेतु cheque/bills की आय (proceeds)

Attach नहीं होती

Attach होती है


अध्याय 15: FIU-Ind रिपोर्ट्स, PEP/CIP व मनी मार्केट

  AML (PMLA Act 2002) — उद्देश्य

  • Money Laundering रोकथाम हेतु उपायों के मुख्य उद्देश्य — i. आपराधिक तत्वों को वित्तीय प्रणाली का उपयोग money laundering गतिविधियों हेतु करने से रोकना।  ii. समाज में आपराधिक गतिविधियों के प्रसार को रोकना।  iii. अर्थव्यवस्था को वित्तीय अपराधों से सुरक्षित रखना।  iv. आतंकवादियों को वित्तीय संसाधनों तक पहुंच प्राप्त करने से रोकना।

  • Money Laundering जोखिम को कम करने के उपाय — a) ग्राहकों व उनके वित्तीय लेनदेन को बेहतर तरीके से जानना/समझना।  b) निर्धारित प्रक्रिया अनुसार संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाना व FIU-Ind को रिपोर्ट करना।  c) लागू कानूनों व नियामक दिशानिर्देशों का पालन करना।  d) स्टाफ को KYC/AML प्रक्रियाओं में पर्याप्त प्रशिक्षण देना — इससे अपराधियों के लिए ML/FT (Financing of Terrorism) हेतु बैंकों का दुरुपयोग करना कठिन हो जाता है।

  Politically Exposed Persons (PEPs) — विस्तृत जानकारी

  • FATF के अनुसार — PEPs ऐसे व्यक्ति हैं जो किसी विदेशी देश में प्रमुख सार्वजनिक पद पर हैं/रह चुके हैं — जैसे राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख, वरिष्ठ राजनेता, वरिष्ठ सरकारी/न्यायिक/सैन्य अधिकारी, राज्य-स्वामित्व वाले corporations के वरिष्ठ executives, महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी अधिकारी।

  • फरवरी 2012 में FATF ने PEPs की परिभाषा का विस्तार किया — अब इसमें domestic (घरेलू)international (अंतर्राष्ट्रीय) दोनों प्रकार के PEPs शामिल हैं।

  • भारत, PEPs की पहचान हेतु FATF की परिभाषा का ही अनुसरण करता है। FATF का मुख्यालय — पेरिस (Paris) में स्थित है।

  • PEPs के लिए अपने वित्तीय हितों को कानूनी entities के माध्यम से छुपाना काफी सामान्य बात है।

  • Risk Categorization के प्रयोजन हेतु — विदेशी मूल के PEPs, उनके निकट संबंधी (close relatives), तथा जहाँ PEP ultimate beneficial owner हो — इन्हें "High Risk Customers" माना जाता है।

  • PEP की श्रेणियां — Domestic PEP, Foreign PEPs, International Organization PEPs, तथा Relatives and Close Associates।

  FATF (Financial Action Task Force)

  • FATF — वैश्विक money laundering व terrorist financing की निगरानी करने वाली संस्था (global watchdog) है। यह अंतर्राष्ट्रीय मानक तय करती है जिनका उद्देश्य इन अवैध गतिविधियों व इनसे समाज को होने वाले नुकसान को रोकना है।

  • भारत 2006 में FATF में 'observer' दर्जे के साथ शामिल हुआ व 2010 में इसका पूर्ण सदस्य (full member) बना।

  CIP — पहचान (Identity) की अवधारणा

  • Identity का सामान्य अर्थ है ऐसे गुणों (attributes) का समूह जो मिलकर किसी 'natural' या 'legal' व्यक्ति की विशिष्ट पहचान स्थापित करते हैं। इन गुणों को "identifiers" कहा जाता है — जो दो प्रकार के होते हैं — (A) Primary व (B) Secondary।

  • Primary Identifiers — इसमें शामिल हैं पूरा नाम, पिता का नाम, जन्मतिथि, पासपोर्ट नंबर, वोटर पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, PAN नंबर आदि — क्योंकि ये व्यक्ति की विशिष्ट पहचान स्थापित करने में सहायक होते हैं।

  • Secondary Identifiers — इसमें पता, स्थान, राष्ट्रीयता व अन्य ऐसी पहचान शामिल है, जो पहचान को और परिष्कृत (refine) करने में सहायक होते हैं। ग्राहक की पहचान केवल आवेदन के समय शुरू व समाप्त नहीं होती — यह एक सतत (ongoing) प्रक्रिया है।

  Customer Identification Procedure (CIP) — व्यक्तिगत खाते हेतु

  • व्यक्तिगत खातों हेतु (RBI द्वारा 6 OVD) — "Officially Valid Document" (OVD), KYC हेतु — 1) Voter ID Card  2) Passport  3) Driving License  4) NREGA Job Card व अन्य  5) National Population Register द्वारा जारी नाम-पता युक्त पत्र  6) UID (Aadhaar) — बशर्ते e-KYC माध्यम (Biometric या OTP आधारित) या Offline verification द्वारा प्रमाणित हो।

  • अनिवार्य दस्तावेज़ — PAN या Form 60 (यथा लागू) अनिवार्य है।

  • सीमित उपयोग हेतु (छोटे खातों के सही स्थायी पते हेतु) — टेलीफोन बिल, bank account statement, recognised authority का letter, बिजली बिल, राशन कार्ड, employer letter (बैंक की संतुष्टि के अधीन)।

  • Aadhaar की Offline Verification — XML file या Aadhaar Secure QR Code के माध्यम से करने पर, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि XML file/QR code generation की तिथि, V-CIP करने की तिथि से 3 कार्यदिवस से अधिक पुरानी न हो।

  CIP — Business Account (व्यावसायिक खाते) हेतु

  • आवश्यक विवरण — 1) कंपनी का नाम  2) व्यवसाय का मुख्य स्थान (Principal Place of Business)  3) कंपनी का mailing address  4) टेलीफोन/फैक्स नंबर।

  • आवश्यक दस्तावेज़ — a) Certificate of Incorporation, Memorandum व Articles of Association सहित  b) खाता खोलने संबंधी Board of Directors का निर्णय व खाता संचालन हेतु अधिकृत व्यक्तियों की सूची  c) प्रबंधन/executives/कर्मचारियों को कंपनी की ओर से व्यवसाय संचालन का अधिकार प्रदान करने वाला दस्तावेज़  d) PAN allotment letter की प्रति  e) टेलीफोन बिल की प्रति।

  KYC — लेनदेन की निगरानी (संदिग्ध संकेत)

  • ग्राहक द्वारा लेनदेन में शामिल जानकारी की गोपनीयता (secrecy) को लेकर असामान्य उत्सुकता दिखाना।

  • ऐसी जानकारी देने से इनकार करना जो सामान्य परिस्थितियों में ग्राहक को बैंकिंग सेवाओं हेतु पात्र बनाती।

  • लेनदेन के बारे में भ्रामक (confusing) विवरण देना।

  • किसी विशेष निधि (funds) के उद्देश्य को बताने में हिचकिचाना या इनकार करना।

  • ऐसे कई deposit slips/cheques के माध्यम से नकद जमा/निकासी करना जिससे हर जमा की राशि सामान्य लगे, परन्तु सभी credit/debit का कुल योग महत्वपूर्ण हो।

  • ग्राहक के प्रतिनिधियों (representatives) का शाखा से संपर्क करने से बचना।

  • अप्रत्याशित रूप से समस्याग्रस्त ऋणों (problem loans) को चुका देना।

  • बिना किसी स्पष्ट तार्किक कारण के एक ही इलाके में कई संस्थाओं में खाते रखना।

  • जब ग्राहक को currency transaction reporting/सूचना सत्यापन/record keeping संबंधी आवश्यकताओं की जानकारी दी जाए, तो लेनदेन बदलने या रद्द करने का प्रयास करना।

  • नियमित रूप से बिना पर्याप्त बैलेंस के बड़ी राशि के cheque जारी करना, फिर नकद जमा करना।

  • असंबद्ध खातों से इंटरनेट (या अन्य electronic माध्यम) के जरिए अचानक धन का हस्तांतरण, फिर तुरंत ATM से निकासी।

  Financial Intelligence Unit-India (FIU-IND) को रिपोर्टिंग आवश्यकताएं

  • बैंक को PML (Maintenance of Records) Rules, 2005 के Rule 3 में उल्लिखित जानकारी, Rule 7 के अनुसार Director, FIU-IND को प्रस्तुत करनी होती है।

  • FIU-IND को प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट्स — 1) Cash Transaction Report (CTR)  2) Suspicious Transaction Reports (STR)  3) Counterfeit Currency Report (CCR)  4) Non-Profit Organizations Transaction Report (NTR)  5) Cross-border Wire Transfer Report (CWTR)।

  1. Cash Transaction Report (CTR)

  • यह रिपोर्ट उन सभी नकद लेनदेन की होती है जिनका मूल्य ₹10 लाख या उसके बराबर विदेशी मुद्रा से अधिक हो, तथा उन सभी परस्पर जुड़ी नकद लेनदेन की श्रृंखलाओं की जिनका मूल्य ₹10 लाख से कम-कम हो, परन्तु यदि ऐसी श्रृंखला एक महीने के भीतर हो व उनका कुल मूल्य ₹10 लाख से अधिक हो जाए। हालांकि, ₹50,000/- से कम की व्यक्तिगत entries को CTR में रिपोर्ट नहीं किया जाएगा।

  • प्रत्येक माह की CTR, अगले महीने की 15 तारीख तक FIU-IND को प्रस्तुत की जाएगी।

  • FIU-IND को ओर से प्रस्तुत की गई मासिक CTR की एक प्रति संबंधित शाखा में (MIS Report: Misc Reports Module के माध्यम से) auditors/Inspectors को दिखाने हेतु उपलब्ध होती है।

  2. Suspicious Transaction Reports (STR)

  • संदिग्ध लेनदेन तय करते समय बैंक, PMLA Rules में समय-समय पर संशोधित "suspicious transaction" की परिभाषा से मार्गदर्शित होगा।

  • कई बार ऐसा होता है कि ग्राहक से कुछ विवरण/दस्तावेज़ मांगने पर वह लेनदेन को छोड़ (abandon) देता है/बीच में रोक (abort) देता है। बैंक ऐसे सभी प्रयासित लेनदेन (attempted transactions) को STR में रिपोर्ट करेगा, भले ही ग्राहक द्वारा पूरा न किया गया हो — लेनदेन की राशि की परवाह किए बिना।

  • बैंक, Principal Officer द्वारा निष्कर्ष निकालने की तिथि से 7 दिन के भीतर STR प्रस्तुत करना सुनिश्चित करेगा।

  • जिन खातों में STR दाखिल की गई हो, उन पर संचालन को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा। STR की प्रस्तुति को PML Rules के अनुसार पूर्ण रूप से गोपनीय (confidential) रखा जाएगा — यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी स्तर पर ग्राहक को इसकी जानकारी न मिले (कोई tipping off न हो)।

  • संदिग्ध लेनदेन की निगरानी व रिपोर्टिंग की प्राथमिक जिम्मेदारी शाखा की होगी।

  • "Suspicious Transaction" — इसमें प्रयासित लेनदेन (चाहे नकद में हो या न हो) भी शामिल है, जो नेकनीयती (good faith) से कार्य करने वाले व्यक्ति को असामान्य या अनुचित रूप से जटिल परिस्थितियों में किया गया प्रतीत हो। बैंक ने पूर्व-निर्धारित परिदृश्यों (pre-defined scenarios) के आधार पर दैनिक AML alerts जनरेट करने हेतु एक AML system लागू किया है।

  3, 4, 5. CCR, NTR व CWTR

  • Counterfeit Currency Report (CCR) — जहाँ नकली/जाली currency notes को असली के रूप में उपयोग किया गया हो, या किसी valuable security/document की जालसाजी (forgery) से लेनदेन को सुविधाजनक बनाया गया हो — ऐसे नकद लेनदेन FIU-India को निर्धारित प्रारूप में, अगले माह की 15 तारीख तक रिपोर्ट किए जाएंगे।

  • NTR (Non-Profit Organizations Transaction Report) — बैंक, Non-Profit Organizations की ओर से प्राप्त ₹10 लाख या इसके बराबर विदेशी मुद्रा से अधिक मूल्य की सभी receipts, Director FIU-IND को अगले माह की 15 तारीख तक रिपोर्ट करेगा।

  • CWTR (Cross-Border Wire Transfer Report) — बैंक, Director FIU-IND को — ऐसे सभी cross-border wire transfers की, जिनका मूल्य ₹5 लाख या इसके बराबर विदेशी मुद्रा से अधिक हो, जहाँ fund का origin या destination भारत में हो — अगले माह की 15 तारीख तक CWTR दाखिल करेगा।

  Principal Officer (PO)

  • "Principal Officer (PO)" — बैंक द्वारा नामित एक अधिकारी, जो Rules के Rule 8 के अनुसार जानकारी प्रस्तुत करने हेतु उत्तरदायी होता है। यह अधिकारी management स्तर का होना चाहिए।

  • Principal Officer के contact details — नाम, पदनाम व पता — FIU-IND को व साथ ही RBI को भी संप्रेषित किए जाने चाहिए।

  • Principal Officer, Chief General Manager, FRMD के माध्यम से Designated Director को रिपोर्ट करेगा, जो Centralized AML Cell के प्रशासनिक प्रमुख (administrative head) होंगे तथा PML Act/KYC Policy अनुसार Centralized AML Cell के कामकाज की देखरेख करेंगे।

  • Principal Officer, money laundering के विरुद्ध लड़ाई व terrorism financing को रोकने में शामिल enforcement agencies, बैंकों व अन्य संस्थाओं के साथ निकट संपर्क (close liaison) बनाए रखेगा।

  मनी मार्केट व कैपिटल मार्केट — परिचय

  • Financial Market दो भागों में बंटा है — Money Market (short term/लघु अवधि) व Capital Market (long term/दीर्घ अवधि)।

  • Money Market के मुख्य साधन — Call Money, Treasury Bills (T-Bills), Certificate of Deposits (CD) व Commercial Papers (CP)।

  • Capital Market — Primary Market (नए issue) व Secondary Market (मौजूदा securities की खरीद-बिक्री) में विभाजित है।

  Money Market के उप-बाजार (Sub-markets)

  • मुख्य 3 उप-बाजार — 1) Call Money  2) Notice Money  3) Term Money।

  • Call, Notice व Term Money भारतीय money market के उप-बाजार हैं — Banks व PDs (Primary Dealers) के बीच धन का उधार लेना/देना, अपनी अल्पकालिक fund mismatch को पूरा करने हेतु overnight या कम अवधि के लिए, यह उधार-लेनदेन असुरक्षित (unsecured) आधार पर होता है।

  • Call Money — इसके तहत धन का लेनदेन एक overnight आधार पर होता है (1 दिन के लिए उधार लेना या देना)।

  • Notice Money — यदि धन 2 दिन से 14 दिन के बीच की अवधि हेतु उधार लिया/दिया जाए, तो इसे Notice Money कहा जाता है।

  • Term Money — "Term Money" का अर्थ है, 14 दिन से अधिक व 1 वर्ष तक की अवधि हेतु असुरक्षित निधि (unsecured funds) में उधार लेना या देना।

  FAQ — Money Market

  • प्रश्न: भारत में मनी मार्केट का विनियमन कौन करता है? — वर्तमान में, Reserve Bank of India व Securities and Exchange Board of India (SEBI) देश में money market को विनियमित करते हैं।

  • प्रश्न: Government Securities (G-Secs) जैसे T-Bills कैसे जारी किए जाते हैं? — G-Secs, RBI द्वारा अपने electronic platform "E-Kuber" के माध्यम से नीलामी (auctions) द्वारा जारी किए जाते हैं।

  • Money Market instrument क्या है? — Money Market instruments अल्पकालिक वित्तपोषण (financing) साधन हैं जिन्हें आसानी से नकद में परिवर्तित किया जा सकता है। Interbank loans (बैंकों के बीच loans), money market mutual funds, commercial paper, treasury bills, तथा securities lending व repurchase agreements — ये सभी money market instruments के उदाहरण हैं।

  • प्रश्न: क्या money market instruments पूरी तरह जोखिम-मुक्त होते हैं? — नहीं, क्योंकि बैंकों के विफल होने या बड़ी कंपनियों द्वारा दिवालिया घोषित होने की संभावना अभी भी बनी रहती है, भले ही यह काफी कम हो।

  1. Treasury Bills (T-Bills)

  • Treasury Bills — धन जुटाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं। इनकी परिपक्वता अवधि अल्पकालिक होती है, जो अधिकतम 1 वर्ष तक होती है।

  • T-Bills 3 अलग-अलग परिपक्वता अवधियों में जारी किए जाते हैं — 1) 91-दिवसीय T-Bills  2) 182-दिवसीय T-Bills  3) 364-दिवसीय T-Bills।

  • T-Bills, face value से discount पर जारी किए जाते हैं। परिपक्वता पर निवेशक को face value राशि मिलती है — प्रारंभिक मूल्य व face value के बीच का यह अंतर ही निवेशक द्वारा अर्जित रिटर्न है।

  • ये सबसे सुरक्षित short-term fixed-income निवेश माने जाते हैं क्योंकि इन्हें भारत सरकार का समर्थन प्राप्त है।

  2. Commercial Papers (CP)

  • बड़ी कंपनियां व व्यवसाय अल्पकालिक व्यावसायिक आवश्यकताओं हेतु पूंजी जुटाने के लिए promissory notes जारी करते हैं, जिन्हें Commercial Papers (CPs) कहा जाता है। इन फर्मों की credit rating उच्च होती है, जिस कारण CPs असुरक्षित (unsecured) होते हैं — कंपनी की credibility ही इस वित्तीय साधन की सुरक्षा के रूप में कार्य करती है।

  • CPs जारी करने वाले — Corporates, Primary Dealers (PDs) व All-India Financial Institutions (FIs)।

  • CP का न्यूनतम मूल्यवर्ग (denomination) ₹5 लाख व इसके गुणकों में होना चाहिए।

  • CP की मूल अवधि (original tenor) 7 दिन से 1 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

  • CP जारी करने हेतु कंपनी की tangible net worth ₹4 करोड़ होनी चाहिए।

  • CP हेतु न्यूनतम credit rating — SEBI द्वारा निर्धारित rating symbol व परिभाषा अनुसार 'A3' होनी चाहिए।

  3. Certificate of Deposits (CD)

  • CDs, बैंकों व वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी किए गए वित्तीय assets हैं। ये निवेशित राशि पर निश्चित maturity date हेतु एक fixed interest rate प्रदान करते हैं।

  • Certificate of Deposits किनके द्वारा जारी किए जा सकते हैं — 1) Scheduled Commercial Banks  2) Regional Rural Banks  3) Small Finance Banks।

  • CDs का न्यूनतम मूल्यवर्ग ₹5 लाख व इसके बाद ₹5 लाख के गुणकों में जारी किए जाएंगे।

  • CD की जारी होने के समय अवधि (tenor) 7 दिन से कम नहीं1 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

  • बैंकों को CDs के विरुद्ध loan देने की अनुमति नहीं है, जब तक कि RBI द्वारा विशेष रूप से अनुमति न दी गई हो।